आर्य समाज और मनुवाद
आर्य समाज और मनुवाद
जिस प्रकार दबंग कहा जाता है तो उसमे कोई एक व्यक्ति का बोध नही होता है बल्कि एक जैसी विचारधारा के लोग होते हैं जो दूसरे समाज को अकारण ही उत्पीडित और परेशान करते रहते हैं यह गैर-शासकीय आतंकवादी होते हैं! इसी प्रकार शासकीय आतंकवादी भी हुए हैं जो शूद्र वर्ग के लोगो को सताने परेशान करने उनका धन छीनने तथा शिक्षा से वंचित करने के लिए महामंत्री की सलाह पर जो कार्य किया करते थे उसे मनुवाद कहते हैं! विभिन्न राज्यों में उनके मंत्रियो द्वारा लिखी गयी स्मृतियों में शूद्र के शोषण की विधियाँ संकलित है जोकि मनु महाराज के काल में बनी भ्रंगु-संहिता से मिलता-जुलता ही है! इसमें दर्जनों सहिंताए हैं जो शूद्र वर्ग(श्रमिक) को उत्पीड़ित करने और सताने के लिए समकालीन राजाओ द्वारा उनके मंत्रियो की सलाह पर लागू की जाती रही हैं सामान्यतः उनके मंत्री ब्राह्मण कुल से आये पुरोहित होते थे जोकि अत्यंत महत्वकांक्षी और लोभी होते थे! ब्राह्मण कुल से आने के कारण राजा इनको सम्मान देता था किन्तु यह मात्र पुरोहित ही होते थे इनको ब्रह्म-विद्या की कोई अनुभूति नही होती थी किन्तु यह ब्राह्मण के तुल्य सम्मान पाते थे यहीं से जातिवाद की जड़ें मजबूत होने लगी और "कर्म" को पैत्रिक-कर्म से जोड़ कर बाध्यकारी बना दिया गया दिया गया ! जो अपने पैत्रिक-कर्म को नही करता उसे दण्डित किया जाता तथा शूद्र वर्ग को धन रखने के अधिकार से वंचित कर दिया गया तथा राजा और ब्राह्मण कुल के लोगो को यह अधिकार दे दिया गया कि वे शूद्र की संपत्ति छीन सकते थे! इस प्रकार शूद्र दिन पर दिन आर्थिक शरीरक और शैक्षिक रूप से कमजोर होता चला गया! विशाल शूद्र समाज को छः हजार उपजातियों में बाँट कर ब्राह्मण कुल के लोगो(पुरोहितो) ने और कमजोर कर दिया इस प्रकार शूद्र संगठनात्मक रूप से कमजोर हो गया और शूद्रो की बगावत हमेशा के लिये समाप्त हो गयी !
जब मुस्लिम इस्लाम धर्म को लेकर भारत में आये तो इसे यहाँ के समाज ने स्वीकार कर लिया, इसलिए वे यहाँ के स्थायी निवासी हो गए और राज्य का धर्म इस्लाम हो गया! किन्तु जब क्रिश्चन धर्म आया और अंग्रेजो ने आईपीसी (भारतीय दंड सहिंता-१८६०) में ब्राह्मण कुल के लोगो के लिए कोई विशेष प्राविधान नही किया (जबकि मुस्लिम काल में ब्राह्मणों पर जजिया कर नहीं लगता था) तो यह दयानंद जैसे लोगो को बहुत अखरने लगा! शूद्र अंग्रेजो के काल में आर्थिक रूप से मंजबूत हो रहा था उसे सेना में जाने का अधिकार था! उसमें शिक्षा का विस्तार हो रहा था इसलिए शूद्रो को शैक्षिक रूप से पुनः भ्रमित करने के लिए कुटिल ब्राह्मण वंशीयो ने आर्य समाज की सन १८७५ में नीव डाली ताकि शूद्र समाज के लोग क्रिश्चन धर्म को न अपनाये किन्तु आर्य सनातनी शूद्रो को किसी रूप में स्वीकार करना नहीं चाहते थे इसीलिए आर्य सनातनियो ने आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती की षड्यंत्र पूर्वक ३० अक्टूबर १८८३ को हत्या कर दी! अब आर्य समाज पर भी आर्य सनातनियो(मनुवादी-ब्राह्मण) का ही कब्ज़ा है ! वे लोग मनु-स्मृति को सही सिद्ध करने के लिए नाना प्रकार के "शब्द-षड्यंत्र" करते रहते है! वे शब्दों के खंडन-मंडन जुटे रहते हैं किन्तु वे कभी भी शुद्र समुदाय को आर्थिक सामाजिक और शैक्षिक रूप से मजबूत नहीं होने देना चाहते हैं वे सदैव पाखंडी-शिक्षा पर जोर देते हैं वैज्ञानिक शिक्षा पर नही देते हैं! शूद समुदाय की वे जातियां/लोग जो आर्य समाज के संपर्क में आ गये ! वे खुद को अन्य शूद्रो से श्रेष्ठ समझने लगे क्योकि वे आर्य समाजियों/सनातनियो (मनुवादी-ब्राह्मण) के "शब्द-जाल" में उलझ गए और यज्ञ-हवन, माला-जप, ॐ-जप में संलिप्त रहने लगे! वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि विगत सौ सालो में आर्य समाज के कारण उनके समाज (शूद्र समाज या श्रमिक समाज) की क्या उन्नति हुई है अगर बाबा साहब का दिया हुआ संविधान न होता तो! आर्य समाजी शूद्र और अन्य शूद्रो को माननीय अरविन्द केजरीवाल और माननीय नरेंद्र मोदी की बात समझ आ जानी चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि बाबा साहब ने ऐसा उदारवादी संविधान न दिया होता तो वे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नहीं हो सकते थे, अर्थात मनुस्मृति के अनुसार वे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे ! विभिन्न राजाओ के समय में संकलित की गयी वे समस्त संहिताए जो शूद्रो के शोषण के लिए बनायीं गयी थी मनुवाद के अंतर्गत आती हैं, जिनके द्वारा शूद्रों को उनके रजनीतिक अधिकार, शैक्षिक अधिकार और आर्थिक अधिकार से वंचित किया गया था! आर्य समाज क्रिश्चन धर्म के प्रभाव से बचाने के लिए कुटिल ब्राह्मण का एक "शब्द-षड्यंत्र" या "शब्द-जाल" या "खंडन-मंडन" था जिससे शूद समाज को आज तक कोई राजनीतिक अधिकार, शैक्षिक अधिकार और आर्थिक अधिकार लाभ नहीं हुआ है !
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